SIR Controversy and Opposition Protest: देश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिल रहा है. कुछ दिन पहले तक SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर नारों की गूंज थी. कांग्रेस से लेकर CJP और AISA तक, अलग-अलग संगठनों के प्रदर्शन सुर्खियां बटोर रहे थे. ऐसा लग रहा था मानो लोकतंत्र की पूरी मशीनरी का सर्विस सेंटर सड़क पर ही खुल गया हो. लेकिन अब त्योहारों का मौसम आया, तो सियासी कैलेंडर में भी छुट्टी की घंटी बजती सुनाई दे रही है.
सड़क पर संघर्ष, फिर त्योहारों का ब्रेक!
विपक्षी दलों ने SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए. प्रदर्शन हुए, बयान आए और इस्तीफे की मांग भी उठी. लेकिन 21 अक्टूबर तक सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, त्योहारों के कारण विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन कार्यक्रमों पर विराम रखा गया है.
अब सवाल यह है कि क्या आंदोलन भी त्योहारों के हिसाब से चलता है? क्या विरोध की आग कैलेंडर देखकर जलती है और छुट्टी पड़ते ही अपने आप धीमी हो जाती है? बेशक, कार्यकर्ताओं को परिवार के साथ त्योहार मनाने का अधिकार है. मगर जनता भी पूछ सकती है कि अगर मुद्दा इतना गंभीर था, तो आंदोलन की अगली रणनीति क्या है? आखिर नारों के बाद अगला कदम भी तो होना चाहिए!
राहुल गांधी वियतनाम में, सियासत में सवालों की बरसात
राहुल गांधी के वियतनाम दौरे की खबरों ने राजनीतिक बहस को और हवा दे दी है. रिपोर्टों के मुताबिक, वह त्योहारों के दौरान कुछ दिनों के निजी ब्रेक पर गए हैं. बीजेपी ने उनकी गैरमौजूदगी पर तंज कसा, जबकि कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है.
अब राजनीति में छुट्टी लेना भी खबर है और छुट्टी पर सवाल उठाना भी राजनीति! आम आदमी छुट्टी पर जाए तो पड़ोसी पूछता है, “कहां घूम आए?” नेता विदेश चले जाएं तो सवाल बन जाता है, “आंदोलन कौन संभालेगा?” लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है, लेकिन निजी यात्रा को अपने आप में किसी की नीयत का सबूत मान लेना भी उचित नहीं.
CJP का आंदोलन और नेतृत्व की नई चर्चा
CJP प्रमुख अभिजीत दीपके ने सौरभ दास और आशुतोष रांका की नेतृत्व क्षमता की तारीफ की है. उन्होंने दोनों को मजबूत और बेहतर नेता बताया. साथ ही, दिवाली तक समर्थकों से आंदोलन रोककर परिवार के साथ समय बिताने की अपील की है.
अब व्यंग्य की बात यह है कि राजनीति में नेता की तारीफ भी कभी-कभी राजनीतिक पहेली बन जाती है. कोई अपने साथियों को असली नेतृत्वकर्ता बताए, तो कुछ लोग कहने लगते हैं कि जिम्मेदारी आगे सरका दी गई. जबकि दीपके ने अपने बाद के संदेश में दोनों के प्रति सम्मान जताया और शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रखने की बात कही. यानी मामला उतना सीधा नहीं, जितना सोशल मीडिया की बहस में दिखाई देता है.
प्रशांत भूषण और नेहा बोरा पर भी सवाल, लेकिन तथ्य जरूरी
प्रशांत भूषण की सक्रियता को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाएं हो सकती हैं, वहीं नेहा बोरा की ओर से हालिया सार्वजनिक बयान कम दिखाई देने पर भी लोग सवाल उठा सकते हैं. लेकिन किसी के सार्वजनिक रूप से कम दिखने को “अंडरग्राउंड” होना या डर जाना कह देना बिना प्रमाण के जल्दबाजी होगी. राजनीति में चुप्पी के कई कारण हो सकते हैं- रणनीति, व्यस्तता या बस कुछ समय तक सार्वजनिक बयान न देना. सोशल मीडिया पर किसी की गैरमौजूदगी को डर का प्रमाणपत्र बांटना आसान है, तथ्य जुटाना थोड़ा कठिन काम है.
मोदी सरकार का BP नॉर्मल, विपक्ष की राजनीति का क्या?
अब आते हैं सबसे मजेदार सवाल पर- अगर मोदी सरकार का BP सामान्य है, तो विपक्ष की राजनीति में इतनी बेचैनी क्यों दिखाई देती है? और अगर कभी राजनीतिक तापमान बढ़ गया, तो क्या होगा?
सच यह है कि किसी सरकार का BP नापने की कोई राजनीतिक मशीन हमारे पास नहीं है. सरकार की आलोचना करना विपक्ष का काम है और विपक्ष से सवाल पूछना जनता का अधिकार. लेकिन विरोध का असली दम नारों की आवाज से नहीं, मुद्दों की गंभीरता, तथ्यों और लगातार लोकतांत्रिक प्रयासों से मापा जाता है.
आखिर लोकतंत्र कोई दिवाली का पटाखा नहीं, जो कुछ देर जोर से फूटे और फिर धुआं छोड़कर गायब हो जाए. SIR पर सवाल हैं, तो उनका जवाब तथ्य और पारदर्शिता से मिलना चाहिए. विपक्ष विरोध करता है, तो उसे अपनी रणनीति और निरंतरता भी दिखानी चाहिए और सरकार को भी आलोचना का जवाब तर्क से देना चाहिए, तंज से नहीं.
कुल मिलाकर, त्योहारों का ब्रेक अपने आप में न डर का सबूत है, न हार का. असली परीक्षा छुट्टी के बाद होगी कि कौन मुद्दे पर लौटता है, कौन केवल बयान देता है और कौन जनता के सवालों का ठोस जवाब लेकर आता है. राजनीति में असली धमाका पटाखों से नहीं, तथ्यों से होना चाहिए.
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