SIR Controversy 2026: चुनाव आयोग, SIR और EVM को लेकर विपक्ष के लगातार सवालों के बीच अब सियासी बहस एक अलग दिशा में पहुंच गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे चुनावी रिकॉर्ड को सामने रखते हुए बीजेपी समर्थक खेमे की ओर से विपक्ष के आरोपों पर तीखा पलटवार किया जा रहा है. तर्क यह है कि मोदी ने अलग-अलग चुनाव और अलग-अलग चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल में जीत हासिल की है, इसलिए हर चुनावी हार का कारण EVM, SIR या चुनाव आयोग को बताना राजनीतिक रूप से पर्याप्त जवाब नहीं माना जा सकता.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी चुनाव में जीत अपने आप में EVM या चुनाव प्रक्रिया से जुड़े हर विवाद को खारिज करने का प्रमाण नहीं होती. चुनावी प्रक्रिया पर उठाए गए किसी भी सवाल का जवाब तथ्य, जांच और संस्थागत प्रक्रिया से ही तय होता है.
2002 से लगातार चुनावी जीत का रिकॉर्ड
नरेंद्र मोदी अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 2002, 2007 और 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने उनके नेतृत्व में सरकार बनाई. 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने और 2014, 2019 व 2024 के लोकसभा चुनावों में लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाने में सफल रहे. संसद की आधिकारिक प्रोफाइल भी मोदी के 2002 से 2014 तक गुजरात विधानसभा के सदस्य रहने और 2014, 2019 व 2024 में लोकसभा के लिए चुने जाने की पुष्टि करती है. यानी मोदी का चुनावी सफर सिर्फ एक चुनाव या एक चुनाव आयोग के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा.
2004 से 2014 तक कांग्रेस सत्ता में थी, फिर भी मोदी जीते
सियासी तंज का एक प्रमुख हिस्सा यह है कि 2004 से 2014 तक केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी. उस दौरान मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव जीत चुके थे. इसके बाद 2014 में उन्होंने केंद्र की सत्ता हासिल की. 2019 में दोबारा बहुमत के साथ सरकार बनाई और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने.
यही चुनावी इतिहास अब बीजेपी समर्थकों के उस तर्क का आधार बन रहा है कि जीत को केवल मौजूदा चुनाव आयुक्त या मौजूदा चुनावी व्यवस्था से जोड़ना पर्याप्त नहीं है.
ज्ञानेश कुमार से पहले भी जीत, बाद में भी
ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था. इससे पहले मोदी 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव जीत चुके थे. CEC ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में 2024 का लोकसभा चुनाव नहीं हुआ था, इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि मोदी की राष्ट्रीय चुनावी जीतों का बड़ा हिस्सा उनके CEC बनने से पहले हुआ था.
इसी तथ्य को लेकर सत्ता पक्ष के समर्थक सवाल उठा रहे हैं कि अगर चुनावी जीत का पूरा श्रेय या दोष सिर्फ मौजूदा CEC को दिया जाए तो पहले के चुनावों की सफलता को कैसे समझाया जाएगा?
‘EVM से भी जीतेंगे, बैलेट से भी’ वाला तंज
विपक्ष द्वारा EVM और SIR को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच बीजेपी समर्थक तर्क का व्यंग्यात्मक रूप कुछ ऐसा है- “EVM हो या बैलेट पेपर, चुनाव अंततः मतदाता के फैसले से जीता जाता है.”
हालांकि EVM पर तकनीकी और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े सवालों को केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं, VVPAT और उपलब्ध कानूनी उपायों के जरिए देखा जाना चाहिए. चुनाव आयोग के अनुसार, EVM वोट रिकॉर्ड करने और गिनती की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है.
‘सड़क पर लेटने से रील बन सकती है, चुनाव नहीं जीता जाता’
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेताओं के प्रदर्शनों पर निशाना साधते हुए बीजेपी समर्थक खेमे की ओर से सोशल मीडिया शैली में यह तंज भी सुनने को मिल रहा है कि “सड़क पर लेटने से रील अच्छी बन सकती है, लेकिन चुनाव नहीं जीता जाता.” इसका राजनीतिक संदेश साफ है- प्रदर्शन और सोशल मीडिया दृश्यता से राजनीतिक चर्चा तो बन सकती है, लेकिन अंतिम फैसला मतदान के दौरान जनता करती है.
‘कॉपी चेक करने वाले मास्टर को दोष’ वाला तंज
विपक्ष के चुनावी आरोपों पर सबसे तीखा व्यंग्य उस तुलना के जरिए किया जा रहा है जिसमें कहा जा रहा है कि “बच्चा बार-बार फेल हो रहा हो तो कॉपी चेक करने वाले मास्टर पर ही इल्जाम लगा दिया जाए.” इस तंज के जरिए चुनावी हार की जिम्मेदारी EVM, SIR या चुनाव आयोग पर डालने की विपक्षी रणनीति पर सवाल उठाया जा रहा है. दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए उठाना उसका अधिकार है.
असली बहस जनता के भरोसे और काम पर
आखिरकार चुनाव केवल EVM या बैलेट का तकनीकी सवाल नहीं है. चुनाव में संगठन, उम्मीदवार, मुद्दे, सरकार का रिकॉर्ड, विपक्ष की रणनीति और सबसे बढ़कर मतदाताओं का फैसला कई कारकों से प्रभावित होता है.
इसलिए मोदी की लगातार चुनावी जीत का रिकॉर्ड विपक्ष के लिए राजनीतिक चुनौती जरूर है, लेकिन SIR, EVM या चुनाव आयोग से जुड़े किसी भी सवाल का समाधान तथ्यों और पारदर्शी संस्थागत प्रक्रिया से ही होना चाहिए. यही चुनावी लोकतंत्र में बहस को आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाने का रास्ता है.
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