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अमेरिका-ईरान समझौते से इजरायल नाराज, हमले जारी रखने का किया ऐलान

Israel Opposes America Iran Deal: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए नए शांति समझौते ने वैश्विक स्तर पर राहत की उम्मीद जगाई है. 15 जून 2026 को सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, दोनों देशों ने युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और परमाणु मुद्दों पर आगे बातचीत के लिए एक प्रारंभिक समझौते पर सहमति बनाई है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा विरोधी इजरायल बनकर उभरा है. इजरायली नेतृत्व ने साफ संकेत दिया है कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं है और अपनी सुरक्षा नीति के तहत सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा.

अमेरिका-ईरान के बीच क्या बनी सहमति?
करीब चार महीने से जारी संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान ने एक प्रारंभिक शांति ढ़ांचे पर सहमति बनाई है. प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों देश सैन्य कार्रवाई रोकेंगे, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजरानी सामान्य होगी और अगले 60 दिनों तक परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत व अन्य विवादित मुद्दों पर विस्तृत वार्ता होगी.

समझौते के तहत ईरान की जमी हुई अरबों डॉलर की विदेशी संपत्तियों को आंशिक रूप से जारी करने की भी चर्चा है. इस खबर के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली और तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई.

इजरायल ने क्यों खड़े किए सवाल?
इजरायल का आरोप है कि यह समझौता ईरान की वास्तविक सैन्य क्षमता को कमजोर नहीं करता. तेल अवीव का मानना है कि समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों और उसके रणनीतिक नेटवर्क पर कोई ठोस प्रतिबंध नहीं लगाया गया है.

इजरायली सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान को आर्थिक राहत मिलती है तो वह भविष्य में अपनी सैन्य क्षमता को फिर मजबूत कर सकता है. इसी वजह से इजरायल के कई वर्तमान और पूर्व अधिकारी इस डील को “अधूरा और खतरनाक समझौता” बता रहे हैं.

इजरायल का साफ संदेश- हमला रहेगा जारी
शांति समझौते के बावजूद सबसे बड़ा विवाद इजरायल के रुख को लेकर है. इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश लेबनान, गाजा और सीरिया में अपने सुरक्षा अभियानों को जारी रखेगा. उन्होंने यह भी दोहराया कि इजरायल किसी ऐसे समझौते से बंधा नहीं है जिसमें वह स्वयं पक्षकार न हो.

इस बयान ने पूरे क्षेत्र में नई चिंता पैदा कर दी है. ईरान ने वार्ता के दौरान लेबनान में संघर्ष विराम को महत्वपूर्ण शर्तों में शामिल किया था, लेकिन इजरायल के रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि जमीनी स्तर पर सैन्य तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.

लेबनान बना सबसे बड़ा विवाद
अमेरिका-ईरान समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लेबनान में हिंसा कम करना भी माना जा रहा था. हालांकि इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह दक्षिणी लेबनान से अपनी सैन्य उपस्थिति तुरंत नहीं हटाएगा. यही कारण है कि हजारों विस्थापित लोगों की घर वापसी पर भी अनिश्चितता बनी हुई है.

लेबनानी अधिकारियों ने लोगों को फिलहाल अपने गांवों और कस्बों में लौटने से बचने की सलाह दी है, क्योंकि कई क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है.

परमाणु कार्यक्रम पर अभी भी फंसा है मामला
हालांकि दोनों देशों ने युद्ध रोकने पर सहमति जताई है, लेकिन सबसे कठिन मुद्दा अभी भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. आगामी 60 दिनों की बातचीत में यूरेनियम संवर्धन, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु गतिविधियों की सीमाओं पर चर्चा होगी.

इजरायल लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि ईरान की परमाणु क्षमता को पूरी तरह समाप्त किया जाए. वहीं ईरान अपने कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए जरूरी बताता रहा है. यही टकराव भविष्य की वार्ताओं को जटिल बना सकता है.

वैश्विक शक्तियों ने किया स्वागत
भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ सहित कई देशों ने इस समझौते का स्वागत किया है. इन देशों का मानना है कि युद्ध की समाप्ति से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित होगी और मध्य पूर्व में स्थिरता लौट सकती है.

हालांकि यूरोपीय देशों ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी दीर्घकालिक समझौते के लिए ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शी और सत्यापित कदम उठाने होंगे.

क्या शांति समझौता टिक पाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह समझौता स्थायी शांति नहीं, बल्कि संघर्ष में एक अस्थायी विराम है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका और ईरान बातचीत कर रहे हैं, लेकिन इजरायल अभी भी कई प्रमुख बिंदुओं से असहमत है.

यदि इजरायल लेबनान और अन्य क्षेत्रों में अपने सैन्य अभियान जारी रखता है तो क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ सकता है. दूसरी ओर यदि परमाणु मुद्दे पर सहमति नहीं बनती तो पूरा समझौता भी खतरे में पड़ सकता है.

मध्य पूर्व में तनाव कम होगा या बढ़ेगा?
अगले दो महीने अमेरिका, ईरान और पूरे मध्य पूर्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं. जिनेवा में प्रस्तावित वार्ताओं के दौरान यह तय होगा कि यह समझौता स्थायी शांति की दिशा में पहला कदम बनेगा या फिर इजरायल की आपत्तियों और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण एक और अधूरी कूटनीतिक कोशिश बनकर रह जाएगा. फिलहाल इतना तय है कि अमेरिका और ईरान भले ही बातचीत की मेज पर आ गए हों, लेकिन इजरायल के “हमला जारी रहेगा” वाले रुख ने शांति की राह को अभी भी कठिन बना दिया है.

यह भी पढ़ें- दुनिया ने ली राहत की सांस! अमेरिका-ईरान युद्ध समाप्त, डील में क्या-क्या शामिल?

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