Mobile Replacing Parents: देश में तेजी से बदलती पारिवारिक व्यवस्था, बढ़ते स्क्रीन टाइम और बच्चों की परवरिश के तौर-तरीकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि यदि माता-पिता की भूमिका धीरे-धीरे मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल गैजेट्स लेने लगें, तो यह केवल सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि एक गंभीर आपदा का संकेत है. अदालत ने संयुक्त परिवार व्यवस्था के कमजोर होने पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका का कोई विकल्प नहीं हो सकता.
मोबाइल माता-पिता का विकल्प नहीं बन सकता
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि आज कई परिवारों में बच्चों को समय देने के बजाय मोबाइल या टैबलेट थमा दिया जाता है. इससे बच्चे परिवार के सदस्यों के साथ संवाद करने के बजाय डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने लगते हैं. अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास पर प्रतिकूल असर डाल सकती है और भविष्य में समाज के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है.
संयुक्त परिवार व्यवस्था को बताया महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संयुक्त परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह बच्चों को संस्कार, अनुशासन, सहनशीलता और सामाजिक व्यवहार सिखाने का माध्यम भी है. दादा-दादी और अन्य बुजुर्गों के साथ रहने से बच्चों को जीवन के अनुभवों से सीखने का अवसर मिलता है, जो किसी डिजिटल माध्यम से संभव नहीं है. अदालत ने संकेत दिया कि बदलती जीवनशैली के बावजूद परिवारों को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने और पारिवारिक संवाद बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए.
तकनीक का संतुलित उपयोग जरूरी
अदालत ने यह नहीं कहा कि मोबाइल या तकनीक का उपयोग पूरी तरह गलत है, बल्कि यह स्पष्ट किया कि तकनीक का इस्तेमाल संतुलित और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए. शिक्षा, जानकारी और संचार के लिए डिजिटल साधनों का महत्व स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि यदि बच्चे वास्तविक पारिवारिक संवाद से दूर हो जाएं, तो इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं.
विशेषज्ञ भी दे रहे हैं यही सलाह
बाल मनोविज्ञान और शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ लंबे समय से यह सलाह देते रहे हैं कि बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखा जाए और उन्हें परिवार के साथ अधिक समय बिताने के अवसर दिए जाएं. खेलकूद, किताबें, सामूहिक भोजन और घर के बुजुर्गों के साथ बातचीत बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि माता-पिता यदि स्वयं भी मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बचें, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से बेहतर व्यवहार सीखते हैं. परिवार के भीतर संवाद और सहभागिता बच्चों में आत्मविश्वास व भावनात्मक संतुलन विकसित करने में मदद करती है.
समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी किसी नए कानून या बाध्यकारी निर्देश के रूप में नहीं, बल्कि समाज के सामने उभरती चुनौती पर एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखी जा रही है. अदालत ने यह संकेत दिया कि आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल तकनीक के बीच संतुलन बनाए रखना समय की आवश्यकता है.
विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि परिवार बच्चों को पर्याप्त समय, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग देंगे, तो मोबाइल केवल एक उपयोगी साधन रहेगा, माता-पिता का विकल्प नहीं बनेगा. संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों को परिवार का साथ, संवाद और संस्कार लगातार मिलते रहें. यही स्वस्थ समाज और बेहतर भविष्य की मजबूत नींव है.
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