Zero FIR Rules in India: आपातकालीन स्थिति में अपराध का शिकार होने पर सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि शिकायत कहां दर्ज कराई जाए. कई बार पुलिस स्टेशन की सीमा यानी क्षेत्राधिकार को लेकर पीड़ित को एक थाने से दूसरे थाने भेज दिया जाता है. ऐसी परिस्थितियों में जीरो FIR (Zero FIR) आम नागरिक के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर अपराध की सूचना मिलने पर केवल क्षेत्राधिकार के बहाने शिकायत दर्ज करने में देरी न हो.
क्या है जीरो FIR और क्यों है जरूरी?
जीरो FIR ऐसी प्राथमिकी है, जिसे अपराध के घटनास्थल के क्षेत्राधिकार से बाहर स्थित किसी भी पुलिस थाने में दर्ज कराया जा सकता है. उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के साथ जयपुर में गंभीर अपराध होता है और वह दिल्ली पहुंचकर पुलिस से शिकायत करता है, तो दिल्ली पुलिस संबंधित संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज कर उसे उचित कार्रवाई के लिए संबंधित थाने को भेज सकती है.
इसका मकसद पीड़ित को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराना और समय पर जांच की प्रक्रिया शुरू करवाना है. बाद में मामला उस पुलिस थाने को हस्तांतरित किया जा सकता है, जिसके क्षेत्र में अपराध हुआ है.
जीरो FIR का नाम ‘जीरो’ क्यों पड़ा?
जीरो FIR में सामान्य FIR की तरह संबंधित पुलिस थाने की नियमित क्रम संख्या आवंटित नहीं की जाती. इसे शुरुआती तौर पर ‘जीरो’ नंबर दिया जाता है, क्योंकि शिकायत उस पुलिस थाने में दर्ज होती है जिसके पास मामले का क्षेत्राधिकार नहीं होता. बाद में जब मामला क्षेत्राधिकार वाले संबंधित पुलिस थाने को हस्तांतरित किया जाता है, तो वहां उसे नियमित FIR नंबर दिया जा सकता है.
नए कानून में क्या हैं प्रावधान?
1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173(1) के तहत संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना पुलिस थाने को दी जा सकती है, भले ही अपराध उस थाने के क्षेत्राधिकार में न हुआ हो. सूचना मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकती है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना पर तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षर करने का प्रावधान है.
कानून के अनुसार, दर्ज सूचना की प्रति शिकायतकर्ता या पीड़ित को निःशुल्क दी जानी चाहिए. हालांकि, हर विवाद में FIR दर्ज होना अनिवार्य नहीं है, सूचना में संज्ञेय अपराध का खुलासा होना आवश्यक है और कुछ निर्धारित मामलों में प्रारंभिक जांच का प्रावधान भी है.
पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें?
यदि पुलिस संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से मना करती है, तो नागरिक BNSS की धारा 173(4) के तहत संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत डाक से भेज सकते हैं. इसके बाद भी समाधान न मिलने पर धारा 175(3) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट से जांच का आदेश देने की मांग की जा सकती है. शिकायत की प्रति, प्राप्ति का प्रमाण और उपलब्ध साक्ष्य सुरक्षित रखना उपयोगी है.
2026 का ताजा अपडेट: साइबर अपराध में ई-जीरो FIR
जीरो FIR की व्यवस्था अब डिजिटल अपराधों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. 28 जुलाई 2026 को प्रसारित सरकारी समाचार के अनुसार, साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में ई-जीरो FIR सुविधा 18 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शुरू की गई थी और 12,000 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके थे. निर्धारित वित्तीय सीमा से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या हेल्पलाइन 1930 पर दर्ज शिकायत के आधार पर ई-जीरो FIR की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. संबंधित पीड़ित को तीन दिनों के भीतर संबंधित साइबर पुलिस थाने जाकर औपचारिक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है.
आम नागरिक इन अधिकारों को याद रखें
मुफ्त FIR कॉपी: दर्ज सूचना की प्रति निःशुल्क मांगें.
महिला पीड़ितों के विशेष अधिकार: कानून में निर्दिष्ट यौन अपराधों की सूचना महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा दर्ज करने का प्रावधान है.
इलेक्ट्रॉनिक शिकायत: कानून के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने की सुविधा उपलब्ध है, निर्धारित समय में हस्ताक्षर करना जरूरी है.
साइबर धोखाधड़ी में तेजी: आर्थिक साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 पर संपर्क करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें.
जीरो FIR से पीड़ित को कैसे मिलता है न्याय?
जीरो FIR का मूल उद्देश्य पीड़ित को क्षेत्राधिकार के विवाद में उलझने से बचाना और न्याय तक उसकी पहुंच आसान बनाना है. आपात स्थिति में नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत दें, FIR का विवरण सुरक्षित रखें और जरूरत पड़ने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट से संपर्क करें. ध्यान रहे, जीरो FIR दर्ज होना दोष सिद्ध होना नहीं है, आरोपों की जांच कानून के अनुसार होती है.
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