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3% से 10% महीना ब्याज का खेल! देश में बढ़ता सूदखोरी का जाल, जानिए क्या कहता है कानून?

Unlicensed Money Lending India: देश के लगभग हर हिस्से में, चाहे वह गांव हो या शहर, जरूरतमंद लोगों को ऊंचे ब्याज पर पैसा देने का कारोबार तेजी से फैलता दिखाई देता है. देश के लाखों गांवों और कस्बों में ऐसी बातें रोज सुनने को मिलती हैं. किसी को बेटी की शादी करनी है, किसी को इलाज कराना है, किसी को बच्चों की फीस भरनी है तो किसी का छोटा कारोबार ठप हो गया. जब बैंक से तुरंत लोन नहीं मिलता, तब लोग गांव के सेठ, साहूकार या खुद को जमींदार कहने वाले लोगों के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं. यहीं से शुरू होता है वह खेल, जिसमें जरूरतमंद इंसान धीरे-धीरे कर्ज के ऐसे दलदल में फंस जाता है कि निकलना मुश्किल हो जाता है.

“पैसा अभी ले जाइए… बस हर महीने ब्याज समय पर चाहिए”
गांवों में अक्सर सुनने को मिलता है- “मूलधन बाद में दे देना, पहले हर महीने सूद पहुंचा देना.” यही सबसे बड़ा जाल है. मान लीजिए किसी ने एक लाख रुपए उधार लिए. यदि 5 प्रतिशत मासिक ब्याज तय हुआ तो हर महीने 5 हजार रुपए केवल ब्याज देना होगा. मूलधन वहीं का वहीं रहेगा. अगर दो-तीन महीने ब्याज नहीं दिया तो ब्याज पर भी ब्याज जोड़ दिया जाता है. धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन जाती है कि आदमी कर्ज नहीं चुका रहा होता, बल्कि केवल ब्याज भरते-भरते पूरी कमाई गंवा देता है.

दो दिन की देरी… और शुरू हो जाती है बेइज्जती
कई इलाकों से ऐसी शिकायतें सामने आती रहती हैं कि ब्याज देने में दो-चार दिन की भी देरी हो जाए तो साहूकार बार-बार फोन करने लगते हैं. कई मामलों में घर पहुंचकर परिवार के सामने अपमानित करने, गाली-गलौज करने या दबाव बनाने के आरोप भी लगते हैं. याद रखिए, कर्ज की वसूली के नाम पर धमकी देना, मारपीट करना, गाली देना या जबरन दबाव बनाना कानूनन सही नहीं है. यदि ऐसा होता है तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकता है.

क्या भारत में सूद पर पैसा देना गैरकानूनी है?
बहुत से लोग मानते हैं कि ब्याज पर पैसा देना पूरी तरह अवैध है, लेकिन ऐसा नहीं है. भारत में किसी को निजी तौर पर पैसा उधार देना अपने-आप में गैरकानूनी नहीं है. लेकिन यदि कोई व्यक्ति इसे नियमित कारोबार बना लेता है और लगातार ब्याज पर पैसा चलाता है, तो कई राज्यों में लागू Money Lenders Act के तहत उसे लाइसेंस की जरूरत पड़ सकती है. यानी नियम पूरे देश में एक जैसे नहीं हैं. अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून लागू हैं.

3% से 10% महीना! आखिर इतना ब्याज क्यों?
गांवों और छोटे शहरों में कई बार 3 प्रतिशत से लेकर 10 प्रतिशत प्रति माह तक ब्याज वसूले जाने की बातें सामने आती हैं. सोचिए, यदि कोई 10 प्रतिशत मासिक ब्याज ले रहा है तो एक लाख रुपए पर हर महीने 10 हजार रुपए सिर्फ ब्याज देना होगा. साल भर में केवल ब्याज ही मूल रकम से ज्यादा हो सकता है. यही वजह है कि लोग कहते हैं- “साहूकार से लिया कर्ज जल्दी खत्म नहीं होता, बल्कि आदमी को ही खत्म कर देता है.”

गलती सिर्फ साहूकार की है या उधार लेने वाले की भी?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. जरूरत के समय बिना सोचे-समझे ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेना भी जोखिम है. दूसरी ओर, किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर अत्यधिक ब्याज वसूलना और फिर दबाव बनाना भी उचित नहीं कहा जा सकता. असल समस्या तब और बढ़ जाती है जब गांवों में लोगों को सस्ता और आसान संस्थागत ऋण नहीं मिल पाता. ऐसे में, साहूकार ही आखिरी विकल्प बन जाते हैं.

टूट जाते हैं कई परिवार
देश के अलग-अलग राज्यों से समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां भारी कर्ज, लगातार ब्याज और कथित मानसिक दबाव के कारण लोगों ने आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लिया. हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इतना जरूर है कि अत्यधिक कर्ज पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देता है.

क्या कहता है कानून?
यदि कोई लाइसेंस के बिना व्यावसायिक स्तर पर साहूकारी करता है, तो कई राज्यों के कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है. वहीं कर्ज की वसूली के नाम पर धमकी, मारपीट, गाली-गलौज या जबरदस्ती करना भी कानून के दायरे में अपराध बन सकता है.

दूसरी ओर, RBI के नियम मुख्य रूप से बैंकों और NBFC पर लागू होते हैं. गांव के निजी साहूकारों पर कार्रवाई संबंधित राज्य के कानून और सामान्य आपराधिक कानूनों के अनुसार होती है.

आखिर समाधान क्या है?
सूदखोरी की समस्या केवल कानून से खत्म नहीं होगी. जरूरत है कि गांवों तक बैंकिंग सेवाएं आसान हों, लोगों को कम ब्याज पर ऋण मिले और वित्तीय जागरूकता बढ़े. वहीं जरूरतमंद लोगों को भी बिना लिखित दस्तावेज और बिना शर्त समझे किसी से पैसा लेने से बचना चाहिए.

संकट में समझदारी ही सबसे बड़ा सहारा
जरूरत में लिया गया कर्ज गलत नहीं होता, लेकिन बिना सोचे-समझे लिया गया महंगा कर्ज पूरी जिंदगी की कमाई खा सकता है. यही वजह है कि किसी भी आर्थिक संकट में सबसे पहले बैंक, सहकारी समिति या अधिकृत वित्तीय संस्थान का दरवाजा खटखटाना बेहतर माना जाता है. क्योंकि साहूकार का पैसा तुरंत मिल सकता है, लेकिन कई बार उसकी कीमत पूरी जिंदगी चुकानी पड़ती है.

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