Patna High Court Marriage Verdict: पटना हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह की वैधता से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि केवल मतदाता सूची, पुराने दस्तावेज या दूसरे रिकॉर्ड में किसी महिला को पत्नी के रूप में दर्ज कर देना विवाह को कानूनी रूप से साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह का दावा करने वाले पक्ष को विवाह के समय निभाई गई आवश्यक धार्मिक रस्मों और रीति-रिवाजों का प्रमाण भी देना होगा. यह फैसला 13 अगस्त 2026 को सामने आया है और विवाह की वैधता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
क्या है पूरा मामला?
मामला सिवान जिले से जुड़ा है. अदालत के मुताबिक, दुर्गावती देवी की पहली शादी 22 मई 1990 को सुरेश चौधरी से हुई थी. उनके दो बच्चे भी हुए. सुरेश की 1997 में मृत्यु के बाद महिला ने दावा किया कि वर्ष 2002 में उसने अपने दिवंगत पति के छोटे भाई सचिता चौधरी से दोनों परिवारों की सहमति से हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार शादी की थी.
बाद में महिला ने खुद को सचिता की कानूनी पत्नी बताते हुए अधिकारों का दावा किया. हालांकि, पारिवारिक अदालत ने वर्ष 2020 में माना कि कथित दूसरी शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विधिवत संपन्न होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है. इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया.
सप्तपदी और सिंदूरदान का नहीं मिला प्रमाण
पटना हाई कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने पाया कि महिला अपनी कथित शादी की तारीख और स्थान तक स्पष्ट रूप से नहीं बता सकी. उसके पक्ष में पेश किए गए गवाह भी यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि विवाह कब और कहां हुआ व उस दौरान कौन-कौन सी रस्में निभाई गईं.
अदालत ने विशेष रूप से कहा कि गवाहों ने सप्तपदी और सिंदूरदान जैसी महत्वपूर्ण रस्मों के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी. इसके अलावा कथित विवाह कराने वाले पंडित के नाम को लेकर भी गवाहों के बयान में विरोधाभास था.
वोटर लिस्ट में पत्नी का नाम भी पर्याप्त नहीं
महिला ने अपने दावे के समर्थन में मतदाता सूची समेत कुछ दस्तावेज पेश किए थे. एक रिकॉर्ड में उसे सचिता चौधरी की पत्नी बताया गया था. लेकिन अदालत ने माना कि मतदाता सूची में पत्नी के रूप में नाम दर्ज होना अपने आप में वैध हिंदू विवाह का निर्णायक प्रमाण नहीं है.
अदालत को विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र भी नहीं मिला और ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे कथित विवाह का विधिवत संपन्न होना साबित हो सके. इसलिए हाई कोर्ट ने पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी.
हिंदू विवाह में रस्मों का कानूनी महत्व
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत हिंदू विवाह संबंधित पक्षों के प्रचलित रीति-रिवाजों और रस्मों के अनुसार संपन्न हो सकता है. पटना हाई कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि जहां संबंधित परंपरा में सप्तपदी विवाह की आवश्यक रस्म है, वहां सातवां कदम पूरा होने पर विवाह पूर्ण और बाध्यकारी माना जाता है.
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर हिंदू विवाह में केवल एक ही रस्म अनिवार्य है. असल मुद्दा यह है कि जिस परंपरा के अनुसार विवाह होने का दावा किया जा रहा है, उसके तहत आवश्यक विवाह संस्कार वास्तव में हुए थे या नहीं, इसका विश्वसनीय प्रमाण अदालत में महत्वपूर्ण हो सकता है.
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