Supreme Court on Prostitution: देश में वेश्यावृत्ति और सेक्स वर्क को लेकर लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस चलती रही है. इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा और सहमति से सेक्स वर्क में शामिल है, तो उसे अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता. अदालत ने पुलिस और प्रशासन को भी नसीहत दी है कि वे स्वेच्छा से काम कर रहे वयस्क सेक्स वर्करों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार न करें और उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करें.
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
हालिया फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी वयस्क व्यक्ति की सहमति सबसे महत्वपूर्ण तत्व है. यदि कोई महिला या पुरुष बिना दबाव, धमकी या तस्करी के अपनी इच्छा से सेक्स वर्क कर रहा है, तो उसे जबरन “रेस्क्यू” कर संरक्षण गृह में भेजना उचित नहीं होगा. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
कोर्ट ने यह भी माना कि अब तक कई मामलों में तस्करी के शिकार लोगों और स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों को एक ही नजरिए से देखा जाता रहा है, जिससे कई बार उनके मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं.
क्या वेश्यावृत्ति पूरी तरह कानूनी?
सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि “सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति को पूरी तरह कानूनी कर दिया है.” यह दावा पूरी तरह सही नहीं है. सच्चाई यह है कि भारत में किसी वयस्क व्यक्ति द्वारा अपनी सहमति से सेक्स वर्क करना अपने आप में अपराध नहीं माना जाता. लेकिन इससे जुड़ी कई गतिविधियां अब भी कानून के तहत दंडनीय हैं. उदाहरण के लिए मानव तस्करी, देह व्यापार के लिए किसी को मजबूर करना, दलाली करना, वेश्यालय चलाना या नाबालिगों को इस काम में शामिल करना गंभीर अपराध हैं.
यानी अदालत ने वेश्यावृत्ति को पूरी तरह “फ्री” या “अनियंत्रित” नहीं किया है, बल्कि स्वेच्छा से काम कर रहे वयस्क सेक्स वर्करों और तस्करी के मामलों के बीच कानूनी अंतर को रेखांकित किया है.
पुलिस को क्या निर्देश दिए गए?
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया टिप्पणियों में पुलिस को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि कोई वयस्क व्यक्ति अपनी सहमति से सेक्स वर्क कर रहा है तो उसके खिलाफ अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. अदालत ने कहा कि ऐसे लोगों को गिरफ्तार करने, परेशान करने या अपमानित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य सेक्स वर्करों को प्रताड़ित करना नहीं, बल्कि शोषण, तस्करी और व्यावसायिक शोषण पर रोक लगाना है.
किस कानून की हो रही है चर्चा?
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956’ यानी ITPA है. सुप्रीम कोर्ट ने हालिया विश्लेषण में कहा कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उसके व्यावसायिक शोषण और मानव तस्करी को रोकना है. अदालत ने माना कि कानून की व्याख्या करते समय यह समझना जरूरी है कि हर सेक्स वर्कर तस्करी का शिकार नहीं होता और हर मामले को एक जैसी श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है.
मानव तस्करी और स्वैच्छिक सेक्स वर्क में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानव तस्करी संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत गंभीर शोषण का मामला है और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है. वहीं दूसरी ओर, किसी वयस्क व्यक्ति का अपनी इच्छा से किया गया सेक्स वर्क अलग कानूनी स्थिति रखता है. कोर्ट ने राज्यों और एजेंसियों को निर्देश दिया है कि वे पहले यह जांच करें कि संबंधित व्यक्ति तस्करी का शिकार है, दबाव में है या स्वेच्छा से काम कर रहा है. उसी आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जानी चाहिए.
सामाजिक और कानूनी बहस जारी
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों से सेक्स वर्करों के अधिकारों और गरिमा को लेकर बहस को नया बल मिला है. हालांकि कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि मानव तस्करी और यौन शोषण के खिलाफ कड़े कदम भी उतने ही जरूरी हैं.
फिलहाल 1 जून 2026 तक की स्थिति यही है कि भारत में स्वेच्छा से किया गया वयस्क सेक्स वर्क अपने आप में अपराध नहीं माना जाता, लेकिन इससे जुड़े शोषण, तस्करी, दलाली और वेश्यालय संचालन जैसी गतिविधियां अब भी कानून के दायरे में अपराध हैं. सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों का मकसद इसी कानूनी अंतर को स्पष्ट करना और पुलिस कार्रवाई को संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप बनाना है.
यह भी पढ़ें- क्या ट्रेन में शराब की बोतल ले जा सकते हैं? जानिए रेलवे के नियम




