Dhurandhar The Revenge Controversy: फिल्म पाकिस्तान के खिलाफ हो और हंगामा भारत में मचे- ये वही क्लासिक भारतीय विरोधाभास है, जहां देशभक्ति भी “डिबेट” का विषय बन जाती है. “धुरंधर: द रिवेंज” रिलीज क्या हुई, सोशल मीडिया से लेकर न्यूज चैनलों पर जैसे विचारों का महाभारत छिड़ गया. कोई इसे राष्ट्रवाद की आवाज बता रहा है, तो कोई इसे “प्रोपेगेंडा” का तमगा देकर अपनी बुद्धिजीविता का झंडा गाड़ने में जुटा है.
पाकिस्तान विलेन, फिर विवाद क्यों?
सबसे दिलचस्प बात ये है कि फिल्म में अगर पाकिस्तान को खलनायक दिखाया गया है, तो इसमें नया क्या है? दशकों से चली आ रही कड़वाहट, सीमाई तनाव और आतंकवाद के मुद्दे क्या काल्पनिक हैं? या फिर कुछ लोगों को अब इतिहास भी “स्क्रिप्टेड” लगने लगा है? सवाल ये नहीं कि फिल्म कैसी है, सवाल ये है कि आखिर हर बार देश से जुड़ी कहानी आते ही कुछ लोगों की संवेदनशीलता क्यों जाग जाती है?
सोशल मीडिया के ‘जज’ हुए सक्रिय
सोशल मीडिया पर बैठे कुछ “स्वघोषित फिल्म समीक्षक” ऐसे रिएक्ट कर रहे हैं, मानो सेंसर बोर्ड ने नहीं, बल्कि उनके निजी विचारों ने फिल्म को पास करना था. एक वर्ग का तर्क है कि सिनेमा को राजनीति से दूर रहना चाहिए, लेकिन यही लोग विदेशी फिल्मों में दिखाए गए एजेंडा पर ताली बजाते नहीं थकते. तब प्रोपेगेंडा नहीं दिखता, लेकिन यहां आते ही अचानक “नैरेटिव” की चिंता होने लगती है.
बिना देखे ही समीक्षा का ट्रेंड
इस बहस में सबसे ज्यादा सक्रिय वही लोग हैं, जिन्होंने शायद फिल्म देखी भी नहीं है. ट्रेलर देखकर ही फैसला सुना दिया गया- “देशभक्ति का ओवरडोज”, “घिसी-पिटी कहानी”, “नफरत फैलाने वाली फिल्म”. मानो ये लोग फिल्म नहीं, कोर्ट में केस लड़ रहे हों और जज भी खुद ही बन बैठे हों.
संतुलन की नई परिभाषा
सवाल ये भी है कि अगर एक फिल्म भारत के नजरिए से कहानी दिखाती है, तो उसमें गलत क्या है? क्या हर बार “दोनों पक्ष” दिखाना ही संतुलन है, या फिर सच्चाई का अपना भी कोई पक्ष होता है? ये वही देश है जहां क्रिकेट मैच में हारने पर भी टीवी तोड़े जाते हैं और अब फिल्म में दुश्मन को हराने पर कुछ लोगों को “भावनात्मक चोट” लग रही है.
समस्या फिल्म में नहीं, सोच में है
असल में दिक्कत फिल्म से कम, मानसिकता से ज्यादा है. कुछ लोगों के लिए हर देशभक्ति “अतिशयोक्ति” है और हर विरोध “बौद्धिकता”. ऐसे में, “धुरंधर: द रिवेंज” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक आईना बन गई है, जिसमें साफ दिख रहा है कि समस्या पर्दे पर नहीं, बल्कि नजरिए में है.
दर्शकों को करना है फैसला
अब फैसला दर्शकों को करना है कि फिल्म देखें, समझें और अपनी राय बनाएं, या फिर बिना देखे ही सोशल मीडिया पर जंग जारी रखें.
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