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पिस्तौल वाली ‘समाजसेवा’ का अंत! सोशल मीडिया का शेर कानून के सामने ढ़ेर, भरत तिवारी मामले पर बहस तेज

Bharat Tiwari Encounter: समाजसेवा का अर्थ यह नहीं है कि हाथ में पिस्तौल लेकर वीडियो बनाया जाए और कैमरे के सामने खड़े होकर घोषणा की जाए कि SDM को ठोक देंगे. अगर यही समाजसेवा है, तो फिर अपराध और जनसेवा के बीच का अंतर शब्दकोश से हटाना पड़ेगा. दुर्भाग्य से बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में जो कुछ हुआ, उसने इसी खतरनाक मानसिकता की एक झलक दिखा दी.

यह मामला भरत भूषण तिवारी का है, जिसकी बुधवार को पुलिस मुठभेड़ के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई. लेकिन इस घटना के बहाने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है- क्या आजकल सोशल मीडिया पर हथियार लहराकर धमकियां देना भी जननेता बनने की नई योग्यता बन गई है?

वायरल वीडियो से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामले की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई. वीडियो में भरत तिवारी कथित तौर पर हथियार लहराते हुए प्रशासन और जगदीशपुर के SDM को खुली धमकी दे रहा था. लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने का अधिकार सबको है, लेकिन किसी अधिकारी के एनकाउंटर की धमकी देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, सीधे-सीधे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है.

विडंबना यह है कि कुछ लोग हर अपराध को “व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष” का नाम देकर महिमामंडित करने लगते हैं. मानो पिस्तौल जेब में रखते ही व्यक्ति क्रांतिकारी और कानून अपराधी बन जाता हो.

पहली बार पुलिस पहुंची तो सामने आया असली चेहरा
वायरल वीडियो के बाद पुलिस जांच और गिरफ्तारी के लिए भरत तिवारी के घर पहुंची. सामान्य स्थिति में कोई निर्दोष व्यक्ति अपनी बात रखता, कानूनी प्रक्रिया का सामना करता और अपना पक्ष साबित करता. लेकिन यहां कहानी दूसरी थी.

पुलिस और वायरल वीडियो के अनुसार, भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण करने के बजाय पुलिसकर्मियों और दारोगा पर ही पिस्तौल तान दी. काफी देर तक पुलिस टीम को रोके रखा गया और आगे बढ़ने पर गोली मारने की धमकी दी गई, पुलिस को गालियां बकी गईं. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पुलिस को पीछे हटना पड़ा और बाद में अतिरिक्त बल व एसटीएफ के साथ दोबारा कार्रवाई करनी पड़ी.

इसके बाद छत पर खड़े होकर भरत तिवारी ने पुलिस पर फायरिंग भी की और उसने खुद ही इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया. अब सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस पर ही हथियार तान दे, फायरिंग करे तो पुलिस फूल-माला लेकर उसका स्वागत करेगी या कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी?

फेसबुक लाइव का हीरो और जमीन की हकीकत
आजकल सोशल मीडिया ने एक नई बीमारी पैदा कर दी है- “लाइव आओ, धमकाओ और प्रसिद्ध हो जाओ.” कुछ लोगों को लगता है कि फेसबुक लाइव पर बंदूक दिखाने से वे इलाके के रॉबिनहुड बन जाएंगे. कैमरे के सामने दो गालियां, एक-दो धमकियां और कुछ गोलियां चला दीजिए, फिर समर्थकों की फौज तैयार हो जाएगी जो हर कार्रवाई को अन्याय साबित करने निकल पड़ेगी. लेकिन हकीकत यह है कि कानून फेसबुक लाइव देखकर नहीं चलता. कानून वीडियो के लाइक्स नहीं गिनता, बल्कि अपराध और साक्ष्य देखता है.

एनकाउंटर के बाद शुरू हुई नई राजनीति
पुलिस कार्रवाई के दौरान भरत तिवारी को पेट के नीचे गोली लगी. बाद में इलाज के लिए पटना के PMCH ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. यहीं से विवाद का दूसरा अध्याय शुरू हुआ.

पुलिस का दावा है कि गोली आत्मरक्षा में चलाई गई, जबकि परिजनों और कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि उसने फेसबुक लाइव के दौरान सरेंडर कर दिया था, इसके बावजूद उसे गोली मारी गई. मामले की गंभीरता को देखते हुए शाहपुर थानाध्यक्ष सहित आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है और जांच जारी है.

जांच पूरी होने से पहले अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा. लेकिन यह भी उतना ही खतरनाक है कि किसी भी घटना को जातीय चश्मे से देखकर पूरे समाज को भड़काने की कोशिश की जाए.

अपराध का कोई जाति प्रमाणपत्र नहीं होता
घटना के बाद सोशल मीडिया पर भोजपुर सहित बिहार के ब्राह्मणों और भूमिहारों को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिशें भी देखने को मिलीं. यह प्रवृत्ति नई नहीं है. बिहार में जब भी कोई अपराधी कानून के शिकंजे में आता है, कुछ लोग उसका जातीय परिचय खोजने लगते हैं. मानो अपराध करने से पहले अपराधी जाति प्रमाणपत्र जमा करता हो.

सच्चाई यह है कि कानून की नजर में अपराधी सिर्फ अपराधी होता है. यदि जांच में पुलिस दोषी पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन यदि कोई व्यक्ति खुलेआम हथियार लहराकर धमकी देता है और पुलिस पर बंदूक तानता है, फायरिंग करता है तो उसे केवल जातीय पहचान के आधार पर नायक घोषित नहीं किया जा सकता.

क्या अपराधी मानसिक रूप से सामान्य होते हैं?
इस मामले में एक और चर्चा छिड़ी कि भरत तिवारी मानसिक रूप से बीमार था. कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे विक्षिप्त बताया था, जबकि जानकारी के अनुसार, उसके परिवार और गांव के लोगों ने ही उसके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातें कही थीं. हालांकि बड़ा प्रश्न यह है कि अपराध की दुनिया में प्रवेश करने वाले अधिकांश लोगों की मानसिकता आखिर कैसी होती है?

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो किसी असाधारण मजबूरी में हथियार उठाते हैं. अधिकांश मामलों में कारण सत्ता का नशा, भय पैदा करने की इच्छा, दबंग बनने की सनक या बाहुबली कहलाने की लालसा होती है. किसी को इलाके का डॉन बनना होता है, किसी को सोशल मीडिया का शेर. किसी को लगता है कि बंदूक हाथ में आते ही कानून उसकी जेब में आ जाएगा.

कानून का डर खत्म होगा तो अराजकता बढ़ेगी
लोकतंत्र में आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन पुलिस पर पिस्तौल तानना अधिकार नहीं है. प्रशासन की आलोचना करना लोकतांत्रिक है, लेकिन किसी अधिकारी के एनकाउंटर की धमकी देना अपराध है.

यदि ऐसे कृत्यों पर भी कार्रवाई न हो तो कल कोई अदालत में खड़ा होकर न्यायाधीश पर बंदूक तानते हुए खुद को जनता का मसीहा घोषित कर देगा. फिर वही लोग पूछेंगे कि अपराध बढ़ कैसे गया?

समाज को यह तय करना होगा कि वह कानून के शासन के साथ खड़ा है या सोशल मीडिया के उन नकली नायकों के साथ जो लाइक्स और तालियों के लिए हथियारों का प्रदर्शन करते हैं.

क्योंकि इतिहास गवाह है- आज की अनदेखी की गई दबंगई ही कल का संगठित अपराध बनती है और जब अपराधी इतना शक्तिशाली हो जाता है कि आम आदमी घर से निकलने से डरने लगे, तब समाज को समझ आता है कि कानून का डर क्यों जरूरी था.

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