Fake Advocates in India: देश की न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद गंभीर मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है. दावा किया जा रहा है कि देश में प्रैक्टिस कर रहे वकीलों में से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की हो सकती है जिनकी योग्यता, नामांकन या पेशेवर पहचान पूरी तरह सत्यापित नहीं है. इसी चिंता को लेकर बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है, जिसमें कानूनी पेशे के लिए आधार जैसी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), राज्य बार काउंसिलों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जवाब मांगा है.
आखिर क्यों उठी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री की मांग?
देश में पंजीकृत अधिवक्ताओं की संख्या 20 लाख के आसपास मानी जाती है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में दायर हालिया याचिका में करीब 18 लाख नामांकित अधिवक्ताओं का उल्लेख किया गया है. याचिका में कहा गया है कि आज भी ऐसा कोई एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है, जिससे यह तुरंत सत्यापित किया जा सके कि कोई व्यक्ति वास्तव में पंजीकृत वकील है या नहीं. वर्तमान व्यवस्था राज्य बार काउंसिलों में बंटी हुई है और आम नागरिकों, अदालतों व सरकारी एजेंसियों के लिए किसी वकील की योग्यता और नामांकन की जानकारी तुरंत जांचना आसान नहीं है.
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि इसी व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाकर कई लोग फर्जी डिग्री या गलत जानकारी के आधार पर खुद को वकील बताकर अदालतों में पेश हो रहे हैं. याचिका में बार काउंसिल के वरिष्ठ पदाधिकारियों के उन बयानों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें 35 से 40 प्रतिशत तक फर्जी वकीलों की आशंका जताई गई थी.
क्या होगा इस डिजिटल रजिस्ट्री में?
प्रस्तावित National Digital Registry for the Legal Profession of India (NDRLP) को एक केंद्रीकृत तकनीकी प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने की मांग की गई है. इसमें प्रत्येक अधिवक्ता को एक यूनिक नेशनल एडवोकेट आइडेंटिफायर (Unique National Advocate Identifier) दिया जाएगा.
इस डिजिटल रजिस्ट्री में वकील की शैक्षणिक योग्यता, बार काउंसिल में नामांकन की स्थिति, अभ्यास का रिकॉर्ड, अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ी जानकारी और अन्य सत्यापित विवरण शामिल हो सकते हैं. इसके साथ ही QR कोड आधारित सार्वजनिक प्रोफाइल का भी प्रस्ताव रखा गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति कुछ सेकंड में वकील की पहचान सत्यापित कर सके.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने माना कि यह एक अभिनव और तकनीक आधारित विचार है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है. हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनानी है तो देश के कानून विश्वविद्यालयों, राज्य बार काउंसिलों और अन्य संस्थाओं का सहयोग आवश्यक होगा.
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि पहले एक व्यावहारिक मॉडल तैयार करना जरूरी होगा, जिसके बाद इसे देशभर में लागू करने पर विचार किया जा सकता है. याचिकाकर्ता को विस्तृत नीति-पत्र (Policy Paper) दाखिल करने की अनुमति भी दी गई है.
सोशल मीडिया पर वकीलों के आचरण का मुद्दा भी उठा
इस याचिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वकीलों के व्यवहार से भी जुड़ा है. बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मांग की है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया एक स्पष्ट सोशल मीडिया और डिजिटल आचार संहिता तैयार करे.
याचिका में कहा गया है कि कई अधिवक्ता सोशल मीडिया पर प्रचारात्मक वीडियो, पेशेवर उपलब्धियों के अतिरंजित दावे और ऐसे कंटेंट साझा कर रहे हैं जो पेशेवर नैतिकता के नियमों से मेल नहीं खाते. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई और कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुछ ऐसे बयान सामने आए हैं जिनका कानून से कोई संबंध नहीं दिखता. अदालत ने यह भी कहा कि संभव है ऐसे लोगों में कुछ वास्तव में वकील ही न हों.
युवा वकीलों को मजबूत करने पर जोर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केवल फर्जी वकीलों की समस्या पर ही नहीं, बल्कि युवा अधिवक्ताओं की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की. अदालत ने कहा कि यदि युवा वकीलों को बेहतर प्रशिक्षण, अवसर और पेशे में सम्मानजनक स्थान दिया जाए तो कई समस्याएं स्वतः कम हो सकती हैं.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश के कई उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में युवा वकीलों के संगठन सकारात्मक शैक्षणिक गतिविधियां चला रहे हैं, जो भविष्य के लिए अच्छी उम्मीद जगाते हैं.
न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री लागू होती है तो इससे अदालतों, मुवक्किलों और सरकारी संस्थाओं को बड़ी राहत मिल सकती है. किसी भी वकील की पहचान और योग्यता की ऑनलाइन पुष्टि होने से फर्जीवाड़े की संभावना कम होगी. साथ ही कानूनी पेशे में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी.
डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के दौर में यह पहल न्यायिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है. हालांकि इसके लिए राज्यों, विश्वविद्यालयों, बार काउंसिलों और न्यायपालिका के बीच व्यापक समन्वय की आवश्यकता होगी.
जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, BCI, UGC और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. मामले की अगली सुनवाई जुलाई 2026 में होने की संभावना है. अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि सरकार और नियामक संस्थाएं इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती हैं. यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत में वकालत के पेशे की पहचान, सत्यापन और निगरानी की व्यवस्था पूरी तरह बदल सकती है.
यह भी पढ़ें- बैंक अकाउंट में नॉमिनी नहीं? जानिए पैसा निकालने का कानूनी तरीका




