Constituency Delimitation India: भारत में लोकसभा और विधानसभा सीटें बढ़ाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. बढ़ती जनसंख्या और बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि क्या मौजूदा सीटें देश के लोगों का सही प्रतिनिधित्व कर पा रही हैं. करीब 50 साल बाद पहली बार लोकसभा की सीटें बढ़ाने की बात हो रही है. हालांकि, इस बदलाव का असर राज्यसभा या राज्यों की विधान परिषदों पर नहीं पड़ेगा. इसके लिए सरकार दो अलग-अलग बिल लाने की तैयारी में है- एक परिसीमन (सीटों का नया बंटवारा) से जुड़ा और दूसरा संविधान में संशोधन से जुड़ा. इन बिलों को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा.
क्यों उठ रहा है सीटें बढ़ाने का मुद्दा?
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं, जो 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थीं. इसके बाद जनसंख्या के अनुसार सीटों में बदलाव पर 2026 तक रोक लगा दी गई थी. लेकिन पिछले 50 वर्षों में भारत की आबादी तेजी से बढ़ी है. ऐसे में, अब एक सांसद या विधायक पर पहले से कहीं ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी है. यही वजह है कि सीटें बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है.
2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कराने पर विचार कर रही है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिलाओं को 33% आरक्षण लागू किया जा सके. अगर नई जनगणना का इंतजार किया गया, तो इसमें देरी हो सकती है. अगर ये बिल पास हो गए तो अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ेगी और इन सीटों में भी महिलाओं को आरक्षण मिलेगा.
बिल पास कराने में बड़ी राजनीतिक चुनौती
हालांकि, इस बिल को पास कराना आसान नहीं होगा. सरकार को विपक्ष का समर्थन चाहिए, क्योंकि दो-तिहाई बहुमत जरूरी है. विपक्ष की मांग है कि महिलाओं के आरक्षण के अंदर ओबीसी (OBC) के लिए भी अलग कोटा दिया जाए. यही वजह है कि इस मुद्दे पर सभी दलों की सहमति बनाना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है.
क्या है परिसीमन की भूमिका?
सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया परिसीमन (Delimitation) के जरिए होती है. इसमें नई जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं और सीटों की संख्या बढ़ाई या घटाई जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि हर क्षेत्र की आबादी के हिसाब से उसे उचित प्रतिनिधित्व मिल सके.
कितनी बढ़ सकती हैं सीटें?
विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले समय में लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर लगभग 750 से 800 या उससे अधिक हो सकती हैं. इसी तरह, राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है, ताकि स्थानीय स्तर पर भी बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.
महिला आरक्षण से जुड़ा पहलू
महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023) को इसलिए लागू नहीं किया गया था, क्योंकि इसके लिए नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन (सीटों का पुनर्निर्धारण) जरूरी था. अब सीटें बढ़ाने की योजना को महिला आरक्षण से भी जोड़ा जा रहा है. प्रस्ताव है कि नई और बढ़ी हुई सीटों में से 33% महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं. इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा बदलाव आ सकता है.
किन राज्यों पर होगा असर?
इस प्रक्रिया का असर राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे पर भी पड़ेगा. जिन राज्यों की जनसंख्या ज्यादा बढ़ी है, वहां सीटें अधिक बढ़ सकती हैं. वहीं जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि कम रही, उनकी हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है. यही कारण है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो रही है.
लोकतंत्र को मिलेगा नया बल
लोकसभा और विधानसभा सीटें बढ़ाने का मुद्दा केवल संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र को और मजबूत बनाने का प्रयास है. यदि यह प्रक्रिया संतुलित और पारदर्शी तरीके से लागू होती है, तो इससे देश के हर नागरिक की आवाज को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सकेगा.
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