Arvind Kejriwal on NEET Paper Leak: NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा कि मोदी सरकार का पेपर लीक रोकने का कोई इरादा नहीं है, इसीलिए ऐसे बेतुके कदम उठाए जा रहे हैं. आर्मी के जहाजों से पेपर ले जाना, टेलीग्राम बंद करना, क्या इन कदमों से पेपर लीक रुकेंगे? बिल्कुल नहीं.
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि पेपर लीक का धंधा अरबों रुपयों का रैकेट है. इसका पैसा ऊपर तक जाता है. अगर पेपर लीक रुक गए, तो MLA/MP को खरीदने के लिए पैसा कहां से आएगा? केजरीवाल का यह ट्वीट सामने आते ही राजनीतिक बहस तेज हो गई. लेकिन इस बयान के साथ कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं.
पहले सुरक्षा की मांग, अब सुरक्षा उपायों पर सवाल
जब NEET पेपर लीक का मामला सामने आया था, तब विपक्ष ने सरकार पर लापरवाही के आरोप लगाए थे. मांग की गई थी कि परीक्षा सुरक्षा को मजबूत किया जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो.
अब जब सरकार प्रश्नपत्रों के परिवहन में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपना रही है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी बढ़ा रही है, तो इन्हीं कदमों को “बेतुका” बताया जा रहा है. ऐसे में, सवाल उठता है कि यदि सुरक्षा बढ़ाना भी गलत है, तो फिर विपक्ष के अनुसार सही उपाय क्या है?
MLA-MP खरीदने वाला आरोप, लेकिन सबूत कहां है?
केजरीवाल के ट्वीट का सबसे विवादित हिस्सा वह है जिसमें उन्होंने दावा किया कि पेपर लीक का पैसा ऊपर तक जाता है और MLA-MP खरीदने में इस्तेमाल होता है.
मोदी सरकार की पेपर लीक रोकने की नीयत ही नहीं है। इसलिए इस तरह के बेतुके कदम उठाये जा रहे हैं। सेना के जहाज़ों से पेपर ट्रांसपोर्ट करना, टेलीग्राम बंद करना। क्या इन कदमों से पेपर लीक बंद होंगे? बिल्कुल नहीं।
पेपर लीक का धंधा अरबों का धंधा है। पैसा टॉप तक जाता है। पेपर लीक बंद कर… https://t.co/skWpWOBocY
— Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) June 17, 2026
यह कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि बेहद गंभीर आरोप है. यदि किसी राजनीतिक दल या नेता के पास इस दावे के समर्थन में प्रमाण हैं, तो उन्हें जांच एजेंसियों, अदालत या जनता के सामने रखना चाहिए. लेकिन बिना सार्वजनिक सबूत के इतने बड़े आरोप लगाने पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह राजनीतिक हमला ज्यादा है और तथ्य कम?
छात्रों को समाधान चाहिए, सियासी आरोप नहीं
देश के लाखों छात्र और उनके परिवार इस समय परीक्षा की विश्वसनीयता को लेकर चिंतित हैं. उनकी प्राथमिकता यह है कि पेपर लीक कैसे रुके, दोषियों को सजा कैसे मिले और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों.
लेकिन राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र समाधान की बजाय आरोप-प्रत्यारोप बनता जा रहा है. छात्रों को यह सुनने में अधिक दिलचस्पी है कि व्यवस्था को बेहतर कैसे बनाया जाएगा, न कि कौन किस पर नया आरोप लगा रहा है.
हर कदम का विरोध, फिर समाधान क्या है?
इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है. जब सरकार कार्रवाई नहीं करती तो कहा जाता है कि सरकार सो रही है. जब कार्रवाई करती है तो कहा जाता है कि यह दिखावा है. जब सुरक्षा बढ़ाई जाती है तो उसे ड्रामा कहा जाता है. जब जांच होती है तो उसे राजनीति बता दिया जाता है.
ऐसे में, आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विपक्ष किन कदमों का समर्थन करेगा? क्या कोई ऐसा उपाय है जिसे वह सही माने, या फिर हर सरकारी कार्रवाई का विरोध करना ही रणनीति बन चुका है?
शिक्षा के मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत
पेपर लीक का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं है. यह करोड़ों युवाओं के भविष्य, उनके करियर और वर्षों की मेहनत से जुड़ा विषय है. ऐसे में, राजनीतिक दलों से अपेक्षा होती है कि वे ठोस सुझाव दें, सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के उपाय बताएं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करें. लेकिन यदि हर कदम का मजाक उड़ाया जाए और हर निर्णय को साजिश बताया जाए, तो इससे छात्रों का भरोसा मजबूत नहीं होता.
लोकतंत्र में सवाल जरूरी, लेकिन जिम्मेदारी भी
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है. लेकिन सवाल और आरोप में फर्क होता है. आलोचना और निराधार निष्कर्ष में भी अंतर होता है.
आज देश के छात्र सिर्फ यही चाहते हैं- निष्पक्ष परीक्षा और सुरक्षित भविष्य. ऐसे में, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल इस समस्या का समाधान खोजने में योगदान देंगे, या फिर पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे को भी केवल राजनीतिक हमले का हथियार बनाकर छोड़ देंगे?
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