Hunger Strike Controversy: देश में इन दिनों आंदोलन का मौसम कुछ ऐसा चल रहा है कि लगता है लोकतंत्र की नई डाइट शुरू हो गई है- नाश्ता बंद, खाना बंद और कैमरा ऑन! जिसे देखिए, किसी न किसी मुद्दे पर भूख हड़ताल पर बैठा है. कोई छात्रों के लिए भूखा है, कोई रोजगार के लिए, कोई सामाजिक न्याय के लिए तो कोई अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए. अब सवाल यह नहीं कि कौन अनशन पर बैठा है? सवाल यह है कि कौन सच में भूखा है और किसका सिर्फ राजनीतिक पेट भरा जा रहा है?
तख्ती हाथ में, कैमरा सामने और क्रांति शुरू
आज के डिजिटल दौर में आंदोलन करना भी आसान हो गया है. एक टेंट लगाइए, पीछे बड़ा-सा बैनर लगाइए, सामने दो-चार समर्थक खड़े कीजिए और कैमरा ऑन कर दीजिए. फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट डालिए- “जनता के हक के लिए आज से आमरण अनशन!” बस, आंदोलन शुरू! अगले कुछ घंटों में तस्वीरें वायरल, बयान वायरल और समर्थकों के कमेंट शुरू- “आप संघर्ष की मिसाल हैं”, “देश को आप पर गर्व है”, “आप ही असली नेता हैं.” साहब, मुद्दा अभी सरकार तक पहुंचे या न पहुंचे, प्रोफाइल फोटो जरूर अपडेट हो जाती है.
पेट खाली या ‘बैकअप प्लान’ तैयार?
भूख हड़ताल का सीधा मतलब है खाना छोड़ना. लेकिन समय-समय पर सोशल मीडिया पर ऐसे दावे और वीडियो सामने आते रहे हैं, जिनमें कुछ अनशनकारियों पर चोरी-छिपे खाने-पीने के आरोप लगाए गए. अब जनता भी सवाल पूछती है- अगर पेट में कुछ नहीं जा रहा तो ऊर्जा कहां से आ रही है?
दिनभर नारे लगाने की ताकत, घंटों भाषण देने की ऊर्जा और कैमरा देखते ही अचानक आने वाला जोश देखकर जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है. कहीं ऐसा तो नहीं कि सामने बोर्ड लगा हो- “आमरण अनशन”, और पीछे कहीं कोई छोटा-सा बोर्ड लगा हो- “आज का स्पेशल: पिज्जा, बर्गर और कोल्ड ड्रिंक!”
हालांकि किसी व्यक्ति को केवल आरोप या वायरल वीडियो के आधार पर फर्जी कहना ठीक नहीं. लेकिन जब कोई सार्वजनिक रूप से अनशन करता है तो उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठना भी अस्वाभाविक नहीं है.
अनशन कम, ‘कंटेंट’ ज्यादा?
पहले आंदोलन का मकसद होता था- सरकार तक आवाज पहुंचाना. अब कई बार लगता है कि मकसद के साथ एक और लक्ष्य जुड़ गया है- कंटेंट बनाना. सुबह धरना, दोपहर लाइव, शाम बयान और रात में सोशल मीडिया पोस्ट. फिर अगले दिन वही तस्वीर अलग-अलग कैप्शन के साथ- “संघर्ष जारी है”, “सरकार जवाब दे”, “जनता की आवाज दबाई नहीं जा सकती.” जनता सोचती है- भाई, आवाज दबे न दबे, रील जरूर बन गई!
हर अनशन को फर्जी कहना भी गलत
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन एक फर्क समझना जरूरी है. हर अनशन दिखावा नहीं होता और हर आंदोलनकारी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं होता. इतिहास में ऐसे कई संघर्ष हुए हैं, जहां लोगों ने अपनी मांग के लिए वास्तव में भूख, बीमारी और शारीरिक कष्ट झेला. ऐसे लोगों के लिए अनशन प्रचार नहीं, बल्कि प्रतिरोध का आखिरी हथियार रहा है. इसलिए असली सवाल अनशन करने पर नहीं, बल्कि अनशन की नीयत, मुद्दे की गंभीरता और उसके बाद की लड़ाई पर होना चाहिए.
कैमरा बंद होते ही शुरू होती है असली परीक्षा
क्योंकि कैमरे के सामने बैठना आसान है, असली परीक्षा तब शुरू होती है जब कैमरे बंद हो जाते हैं. मांग पूरी नहीं हुई तो क्या आंदोलन जारी रहेगा? सरकार ने जवाब नहीं दिया तो क्या संघर्ष जारी रहेगा? समर्थक घर चले गए तो क्या अनशनकारी अकेला सड़क पर रहेगा? यहीं पता चलता है कि आंदोलन मिशन था या मोशन कैमरे के सामने था.
कहीं ‘राजनीतिक लॉन्चिंग पैड’ तो नहीं बन रहा अनशन?
लोकतंत्र में आंदोलन जनता की आवाज को मजबूत करने का माध्यम है. लेकिन अगर वही आंदोलन सिर्फ चेहरा चमकाने और राजनीतिक पहचान बनाने का जरिया बनने लगे तो सवाल उठेंगे ही. वरना लोकतंत्र में एक नया बिजनेस मॉडल चल सकता है- “पहले अनशन की घोषणा, फिर सोशल मीडिया प्रमोशन और उसके बाद राजनीतिक लॉन्चिंग!” और जनता पीछे से पूछती रह जाएगी- “महाराज, क्रांति तो ठीक है… लेकिन ये बताइए, टेंट के पीछे से खाने की खुशबू क्यों आ रही है?”
जनता को नारे नहीं, नतीजे चाहिए
आखिर जनता को अब सिर्फ नारे नहीं चाहिए, उसे नतीजा चाहिए. पेट सच में खाली हो तो संघर्ष दिखाई देता है, लेकिन अगर सिर्फ कैमरे के लिए पेट खाली दिखाया जा रहा हो, तो जनता भी ज्यादा देर तक बेवकूफ नहीं बनती. आज की जनता ताली भी बजाती है और शक भी करती है और शायद यही लोकतंत्र की सबसे अच्छी ‘डाइट’ है- न अंधा समर्थन, न अंधा विरोध… पहले सवाल, फिर विश्वास!
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