Israel Hezbollah Ceasefire: मध्य पूर्व में कई दिनों से जारी भीषण तनाव के बीच आखिरकार इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच सीजफायर लागू हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इजरायल को संयम बरतने की सलाह दी थी और चेतावनी दी थी कि लगातार बढ़ती सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय शांति प्रयासों को पटरी से उतार सकती है. इसके बाद अमेरिका, कतर और अन्य मध्यस्थों की सक्रिय कूटनीति के कारण दोनों पक्षों ने संघर्ष विराम पर सहमति जताई.
क्या है पूरा मामला?
पिछले 24 घंटों में इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष अचानक तेज हो गया था. हिजबुल्लाह के हमले में चार इजरायली सैनिकों की मौत हुई, जिसके जवाब में इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इन हमलों में दर्जनों लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई. बढ़ती हिंसा के कारण क्षेत्र में बड़े युद्ध की आशंका पैदा हो गई थी.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता तो न केवल लेबनान, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थी. इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने तत्काल हस्तक्षेप किया.
ट्रंप ने इजरायल को क्या कहा?
20 जून 2026 को ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि इजरायल को “कभी-कभी शांत रहना चाहिए और समझदारी से काम लेना चाहिए.” उन्होंने दावा किया कि उनकी पहल और अमेरिकी मध्यस्थता के कारण दोनों पक्ष संघर्ष विराम पर सहमत हुए. ट्रंप ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया.
हालांकि ट्रंप के आलोचकों का कहना है कि केवल अमेरिकी दबाव ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता और संभावित बड़े युद्ध के खतरे ने भी इजरायल को नरम रुख अपनाने के लिए मजबूर किया.
कब से लागू हुआ सीजफायर?
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सीजफायर शुक्रवार शाम स्थानीय समयानुसार 4 बजे से लागू हुआ. इस समझौते को अमेरिका और कतर ने मिलकर तैयार किया, जबकि ईरान की ओर से भी अप्रत्यक्ष सहयोग मिलने की जानकारी सामने आई है.
हालांकि शुरुआती घंटों में कुछ स्थानों पर छिटपुट गोलीबारी और हमलों की खबरें भी आईं, जिससे स्पष्ट है कि जमीन पर स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है.
शांति वार्ता पर पड़ा था असर
इजरायल-हिजबुल्लाह संघर्ष ने अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता को भी प्रभावित किया. स्विट्जरलैंड में होने वाली महत्वपूर्ण बैठक को स्थगित करना पड़ा, क्योंकि क्षेत्रीय हालात तेजी से बिगड़ रहे थे. अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि लेबनान मोर्चे पर लड़ाई जारी रही तो व्यापक कूटनीतिक प्रक्रिया पूरी तरह विफल हो सकती है. विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण था कि वॉशिंगटन ने दोनों पक्षों पर तत्काल दबाव बढ़ाया और संघर्ष विराम को प्राथमिकता दी.
इजरायल ने फिर भी रखी सख्त शर्त
सीजफायर पर सहमति के बावजूद इजरायल ने साफ किया है कि उसकी सेना दक्षिणी लेबनान के कुछ रणनीतिक क्षेत्रों में मौजूद रहेगी. इजरायली सेना का कहना है कि वह भविष्य में हिजबुल्लाह की किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखती है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस संघर्ष विराम को स्थायी शांति नहीं, बल्कि अस्थायी राहत मान रहे हैं.
हिजबुल्लाह का रुख भी नरम नहीं
सीजफायर लागू होने के बावजूद हिजबुल्लाह नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि वह अपने “प्रतिरोध” के सिद्धांत से पीछे नहीं हटेगा. संगठन के महासचिव नईम कासिम ने हालिया बयान में कहा कि संघर्ष विराम का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं है और यदि जरूरत पड़ी तो संगठन फिर से जवाबी कार्रवाई करेगा. इस बयान से संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अभी भी गहरा बना हुआ है.
क्या टिक पाएगा यह सीजफायर?
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि यह सीजफायर कितने समय तक टिकता है. यदि आने वाले दिनों में दोनों पक्ष समझौते का पालन करते हैं तो अमेरिका, लेबनान, इजरायल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच व्यापक शांति वार्ता का रास्ता खुल सकता है. दूसरी ओर, यदि फिर से कोई बड़ा हमला होता है तो संघर्ष और अधिक खतरनाक रूप ले सकता है.
मध्य पूर्व पहले ही वर्षों से युद्ध, आतंकवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है. ऐसे में, यह नया सीजफायर केवल इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच समझौता नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह संघर्ष विराम स्थायी शांति की शुरुआत बनेगा या फिर एक और अस्थायी विराम साबित होगा.
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