CJP School Audit Controversy: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इन दिनों अपने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान को लेकर चर्चा में है. मकसद बताया गया है सरकारी स्कूलों की हकीकत सामने लाना, लेकिन पंजाब पहुंची टीम का सोशल ऑडिट अब खुद सवालों के घेरे में आ गया है. वजह यह है कि जिस ऑडिट में कमियां तलाशने की उम्मीद थी, वहां स्कूल की खूबियां ज्यादा दिखाई गईं. नतीजा यह हुआ कि स्कूलों की हालत से ज्यादा चर्चा ऑडिट करने वालों की नीयत और तरीके की होने लगी.
स्कूल का ऑडिट करने गए थे या तारीफ का रिपोर्ट कार्ड बनाने?
CJP के सह-संयोजक सौरभ दास और लीगल डिपार्टमेंट की प्रमुख रत्ना सिंह ने पंजाब के तीन स्कूलों का दौरा किया. इनमें लुधियाना का एक ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ भी शामिल था. यह स्कूल करीब दो साल पहले शुरू हुआ था और सरकार इसे मॉडल स्कूल के तौर पर पेश करती है.
यहां पहुंचकर सौरभ दास ने स्वीमिंग पूल, बैडमिंटन कोर्ट और AI लैब जैसी सुविधाएं दिखाईं और स्कूल की जमकर तारीफ की. स्कूल के नतीजों को भी सकारात्मक तरीके से पेश किया गया. यानी जिसे लेकर उम्मीद थी कि कैमरा कमियां खोजेगा, वहां कैमरा सुविधाओं की सैर कराने लगा. बस फिर क्या था-सोशल मीडिया को भी सवाल पूछने का नया मौका मिल गया.
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान में स्कूल ही बदल गया?
CJP पर पहले से सवाल उठते रहे हैं कि उसके स्कूल ऑडिट का फोकस मुख्य रूप से बीजेपी शासित राज्यों पर क्यों रहता है. इसी आलोचना के बीच संगठन ने पंजाब, कर्नाटक और झारखंड में भी टीमें भेजीं.
लेकिन पंजाब का वीडियो सामने आने के बाद आलोचकों ने उल्टा सवाल दाग दिया- अगर मकसद सचमुच स्कूलों की स्थिति दिखाना है तो ऐसे स्कूल क्यों नहीं दिखाए गए जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है? आलोचकों का आरोप है कि बीजेपी शासित राज्यों में खराब स्कूलों की तस्वीरें दिखाने वाली CJP ने पंजाब में अपेक्षाकृत बेहतर और नए स्कूल को चुन लिया.
सोशल मीडिया ने पूछा- ऑडिट है या पब्लिसिटी?
सौरभ दास के ‘Punjab Schools Social Audit’ वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई. कई यूजर्स ने ऑडिट की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक ब्रांडिंग या PR जैसा बताया. कुछ लोगों ने यह भी सवाल किया कि अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों वाले राज्यों में CJP का रवैया अलग क्यों नजर आता है.
लोगों का सवाल है कि बीजेपी शासित राज्यों में CJP को ग्रामीण इलाकों के जर्जर स्कूल नजर आते हैं, लेकिन पंजाब पहुंचते ही कैमरे का रुख एक ऐसे स्कूल की ओर हो गया, जिसका उद्घाटन करीब दो साल पहले हुआ है और जिसे सरकार मॉडल स्कूल के तौर पर पेश करती है.
यानी मामला अब सिर्फ स्कूलों की दीवार, लैब और खेल मैदान तक सीमित नहीं रहा. असली सवाल यह बन गया है कि ऑडिट का कैमरा कमियां खोजने निकला था या सरकार के अच्छे काम का वीडियो बनाने?
पुराने सवाल भी फिर लौटे
पंजाब में CJP की गतिविधियों के साथ आम आदमी पार्टी से उसके पुराने जुड़ाव को लेकर भी सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी. यही वजह है कि आलोचक अब पंजाब के स्कूल ऑडिट को भी उसी राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं.
असली ऑडिट तो अब CJP का हो रहा है
विडंबना देखिए- CJP पंजाब के स्कूलों का सोशल ऑडिट करने पहुंची थी, लेकिन लौटते-लौटते सोशल मीडिया ने CJP का ही ऑडिट शुरू कर दिया. सवाल स्कूलों की कमियों से निकलकर चयन की निष्पक्षता, ऑडिट के पैमाने और राजनीतिक पक्षधरता तक पहुंच गए.
अब CJP के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर उसका अभियान वाकई ‘स्कूल ठीक करो’ है, तो क्या वह अगली बार राजनीतिक पहचान से परे जाकर सबसे खराब स्थिति वाले स्कूलों को भी कैमरे के सामने लाएगी? क्योंकि जनता को सिर्फ चमकता हुआ मॉडल स्कूल नहीं, वह स्कूल भी देखना है जहां बच्चों को आज भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार है.
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