Indian Railways: सितंबर की शुरुआत है और दीपावली-छठ में अभी करीब दो महीने बाकी हैं. दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में रहने वाले बिहार, यूपी और दूसरे राज्यों के लाखों लोगों के लिए यह वह समय है, जब वे घर लौटने की तैयारी शुरू करते हैं. लेकिन रेलवे की आरक्षण व्यवस्था देखकर लगता है कि घर जाने का टिकट भी अब किसी सरकारी सुविधा से ज्यादा ‘किस्मत और संपर्क’ का खेल बन गया है.
भारतीय रेलवे ने 2024 में अधिकांश ट्रेनों के लिए एडवांस रिजर्वेशन पीरियड 120 दिन से घटाकर 60 दिन किया था. तर्क था कि इससे वास्तविक यात्रियों को सुविधा मिलेगी और बेवजह की बुकिंग व नो-शो कम होंगे. लेकिन सवाल यह है कि 60 दिन की सुविधा आम यात्री को कितनी मिल रही है?
टिकट खुला और सीट गायब!
त्योहार की तारीख आते-आते कई यात्रियों का अनुभव यही है कि टिकट बुकिंग खुलते ही सीटें तेजी से खत्म हो जाती हैं. कहीं ‘Regret’ तो कहीं इतनी लंबी वेटिंग कि यात्री टिकट देखकर ही समझ जाए कि कन्फर्म होने की उम्मीद रखना भी खुद को दिलासा देना है.
दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में नौकरी करने वाला मध्यमवर्गीय कर्मचारी आखिर करे तो क्या करे? छुट्टी पहले तय करे या टिकट पहले? और अगर टिकट ही नहीं मिला तो त्योहार पर परिवार से मिलने का सपना अगले साल तक सुरक्षित रखे?
विडंबना यह है कि रेलवे खुद यात्रियों को पहले से टिकट बुक करने की सलाह देता है. इस साल भी त्योहारों के दौरान भीड़ को देखते हुए विशेष ट्रेनों और अतिरिक्त सेवाओं की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है.
10 में 8 लोगों ने टिकट बुक ही नहीं की, फिर आखिर सीटें गईं कहां?
यहां सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है. आम यात्रियों के बीच बातचीत करें तो पता चलता है कि बहुत से लोग अभी तक टिकट बुक ही नहीं करा पाए हैं. ऐसे में, सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उपलब्ध सीटों का बड़ा हिस्सा इतनी तेजी से कहां चला जाता है?
क्या मांग का अनुमान सही नहीं है? क्या ट्रेनों में पर्याप्त अतिरिक्त कोच या विशेष ट्रेनें समय पर नहीं जोड़ी जा सकतीं? या फिर टिकट बुकिंग सिस्टम में ऐसी तकनीकी और संचालन संबंधी खामियां हैं, जिनका फायदा कुछ लोग उठा रहे हैं? रेलवे को इन सवालों का पारदर्शी जवाब देना चाहिए.
आम आदमी के लिए वेबसाइट ‘हाउसफुल’, एजेंट के पास ‘कंफर्म’!
सबसे चुभने वाली शिकायत तत्काल टिकट को लेकर है. यात्री बताते हैं कि निर्धारित समय पर वेबसाइट या ऐप पर टिकट हासिल करना बेहद मुश्किल हो जाता है. लेकिन वही यात्री किसी एजेंट के पास जाता है तो उसे कंफर्म टिकट मिलने का दावा किया जाता है, बस किराए से कहीं ज्यादा रकम देने की शर्त के साथ.
मान लीजिए टिकट की कीमत 1,500 रुपए है, तो कुछ यात्रियों के अनुभव के मुताबिक एजेंट के जरिए यही टिकट 3,000 से 3,500 रुपए तक में मिलने की बात सामने आती है. यहीं से रेलवे व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है- अगर आम यात्री के लिए सीट उपलब्ध नहीं है, तो एजेंट के पास सीट आती कहां से है?
रेलवे की कार्रवाई के दावे और जमीन की हकीकत में कितना फर्क?
रेलवे और RPF समय-समय पर टिकट दलालों के खिलाफ कार्रवाई करती रही हैं. रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, 2022 से 2026 के बीच टिकटों की अवैध खरीद-फरोख्त और दलाली से जुड़े हजारों मामले सामने आए. इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया और टिकटों की अवैध बुकिंग में इस्तेमाल की जा रही बड़ी संख्या में IRCTC यूजर आईडी को ब्लॉक या निष्क्रिय किया गया.
यानी यह समस्या महज काल्पनिक नहीं है. रेलवे भी समय-समय पर यह स्वीकार करती रही है कि टिकटों की अवैध खरीद-फरोख्त और दलाली की वजह से आम यात्रियों के लिए टिकटों की उपलब्धता प्रभावित होती है. फिर सवाल वही है- अगर कार्रवाई इतनी प्रभावी है तो त्योहार आते ही वही पुरानी कहानी क्यों दोहराती है?
कंफर्म टिकट का राज क्या है? रेलवे को देना होगा जवाब
रेलवे की वेबसाइट पर आम यात्री लाइन में खड़ा है और एजेंट के पास ‘जुगाड़’ की खिड़की खुली है. अगर ऐसी धारणा बन रही है तो यह रेलवे के लिए बेहद गंभीर स्थिति है. त्योहार सिर्फ अमीरों का नहीं होता. मजदूर, कर्मचारी, छात्र, छोटे कारोबारी और मध्यमवर्गीय लोग भी अपने घर जाना चाहते हैं. उनके लिए ट्रेन सिर्फ परिवहन नहीं, परिवार तक पहुंचने का सबसे सस्ता और भरोसेमंद रास्ता है.
इसलिए रेलवे को सिर्फ यह बताने से आगे बढ़ना होगा कि दलालों पर कार्रवाई हो रही है. उसे यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कितनी सीटें किस कोटे में गईं, कितनी बुक हुईं, कितनी रद्द हुईं और एजेंटों की बुकिंग पर किस स्तर की निगरानी हुई. वरना सवाल यही रहेगा- रेलवे की पटरियां देश को जोड़ रही हैं, लेकिन टिकट व्यवस्था आम आदमी और उसके घर के बीच इतनी लंबी दूरी क्यों बना रही है?
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