Indian Railways: भारतीय रेलवे के सबसे व्यस्त रेल मार्गों पर ट्रेनों की बढ़ती संख्या और परिचालन दबाव को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में 7 रेलवे परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. इन परियोजनाओं का फोकस हाई-डेंसिटी रेल कॉरिडोर की क्षमता बढ़ाने और यात्री व मालगाड़ियों के संचालन को अधिक सुचारु बनाने पर है.
दिल्ली-मुंबई से चेन्नई-कोलकाता तक बड़ा विस्तार
कैबिनेट से मंजूर परियोजनाओं में कोलकाता-दिल्ली, चेन्नई-कोलकाता, दिल्ली-मुंबई, मुंबई-चेन्नई और बिलासपुर-कटनी जैसे महत्वपूर्ण रेल मार्ग शामिल हैं. इसके अलावा मुंबई-हावड़ा हाई-डेंसिटी नेटवर्क पर खड़गपुर-झारसुगुड़ा के बीच चौथी रेलवे लाइन को भी मंजूरी दी गई है. इस परियोजना की लंबाई करीब 367 किलोमीटर और लागत लगभग 6,528 रुपए रुपये बताई गई है.
क्यों जरूरी हैं ये हाई-डेंसिटी रूट?
भारतीय रेलवे के हाई-डेंसिटी नेटवर्क पर यात्री और माल यातायात का दबाव काफी ज्यादा है. रेलवे के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, देश में 7 हाई-डेंसिटी नेटवर्क रूट चिन्हित हैं. इन रूटों पर क्षमता बढ़ाने के लिए डबलिंग, ट्रिपलिंग, अतिरिक्त लाइन, लंबे लूप, ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर कार्य किए जाते रहे हैं.
रेलवे का लक्ष्य इन महत्वपूर्ण कॉरिडोर पर अतिरिक्त क्षमता तैयार करना है, ताकि एक ही ट्रैक पर यात्री और मालगाड़ियों के बीच परिचालन दबाव कम किया जा सके.
क्या अब ट्रेनें लेट नहीं होंगी?
कैबिनेट के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब ट्रेनों की लेटलतीफी खत्म हो जाएगी? इसका जवाब अभी हां कहना जल्दबाजी होगी. अतिरिक्त ट्रैक और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से व्यस्त रूटों पर ट्रेनों के संचालन के लिए ज्यादा जगह मिलेगी और कंजेशन कम करने में मदद मिल सकती है. इससे समयबद्धता में सुधार की उम्मीद है.
लेकिन मौसम खराब होने, तकनीकी खराबी, दुर्घटना, सिग्नलिंग समस्या या अन्य परिचालन कारणों से ट्रेनें भविष्य में भी लेट हो सकती हैं. इसलिए इन परियोजनाओं का सही असर इनके पूरा होने और संचालन में आने के बाद ही सामने आएगा.
सात हाई-डेंसिटी रूट क्यों हैं खास?
रेलवे के हाई-डेंसिटी नेटवर्क में दिल्ली-हावड़ा, हावड़ा-चेन्नई, चेन्नई-मुंबई, मुंबई-दिल्ली, दिल्ली-चेन्नई, मुंबई-हावड़ा और दिल्ली-गुवाहाटी जैसे प्रमुख कॉरिडोर शामिल हैं. इनका कुल नेटवर्क करीब 11,000 किलोमीटर है और ये देश के कुल रेल ट्रैफिक का लगभग 41 प्रतिशत संभालते हैं, जबकि रेलवे नेटवर्क में इनकी हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत है.
यात्रियों और माल ढ़ुलाई दोनों को फायदा
अतिरिक्त रेल लाइन और क्षमता विस्तार से भविष्य में ज्यादा यात्री ट्रेनें चलाने की गुंजाइश बढ़ सकती है. साथ ही मालगाड़ियों के लिए भी अलग परिचालन क्षमता उपलब्ध होगी. इससे देश के प्रमुख औद्योगिक और आर्थिक केंद्रों के बीच माल परिवहन को गति मिलने की उम्मीद है.
यानी मोदी कैबिनेट का यह फैसला सिर्फ नई पटरियां बिछाने तक सीमित नहीं है, बल्कि रेलवे के सबसे व्यस्त नेटवर्क पर आने वाले वर्षों की बढ़ती यातायात जरूरतों के लिए क्षमता तैयार करने की बड़ी योजना का हिस्सा है.
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